Home Special अगर ऐसा ही रहा तो मुंबई और चेन्नई इतिहास के पन्नों में...

अगर ऐसा ही रहा तो मुंबई और चेन्नई इतिहास के पन्नों में हो जाएंगे दर्ज

52
0
SHARE
Janvani News
तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था का नकारात्मक असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। अगर सस्टेनबल विकास नहीं हुआ तो भारत के महानगरों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] ।  फर्ज करें की आप मुंबई, कोलकाता या चेन्नई में रहते हों, किसी सुबह आप नींद से जागें और आपकी कॉलोनी में समंदर का पानी हिलोरे मार रहा हो। आप मदद की गुहार लगाएं और आपको मदद भी न मिल सके तो जिंदगी से हाथ धोना तय समझिए। फिलहाल बरसात के दिनों को छोड़कर आम दिनों में ये खतरा नहीं है लेकिन नासमझी में किए जा रहे विकास की वजह से मानवजाति का वजूद खतरे में है।

हर साल बढ़ रहा है देश का तापमान

आंकड़ें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भारत में देश में पिछले 15 वर्षों के दौरान औसत तापमान हर साल बढ़ता चला गया है। वर्ष 2015 में भारत का वार्षिक तापमान 1961-1990 के औसत से 0.67 डिग्री ज्यादा था, जोकि 1901 के बाद से अब तक का तीसरा सबसे ज्यादा गर्म साल रहा। पिछली एक सदी के दौरान देश के अन्य 9 सबसे गर्म वर्षों में 2009, 2010, 2003, 2002, 2014, 1998, 2006 और 2007 हैं। खास बात ये है कि देश के सबसे ज्यादा गर्म वर्षों में 12 वर्ष पिछले 15 वर्षों (2000-2015) के दौरान ही रहे हैं। इससे आसानी से अंदाजा लग जाता है कि हर वर्ष तापमान बढ़ने की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। पिछले वर्ष जानलेवा गर्मी ने 2500 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था।

खतरे में भारत के महानगर

जलवायु परिवर्तन का बुरा असर तेजी से बढ़ रहे शहरों पर पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के खतरों को आंकने वाली संस्था की नई रिपोर्ट में यह कहा गया है। भारत, बांग्लादेश और अफ्रीका के बड़े शहर बहुत ज्यादा प्रभावित होंगे।

मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई चारों हाई रिस्क में हैं। तेजी से बढ़ते इन शहरों में मकान बन रहे हैं। लेकिन इन शहरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। जरा सी बारिश होने पर इन शहरों की सड़कें ल बारिश आई नहीं कि सड़कें लबालब हो जाती हैं।
एशिया और अफ्रीका में तेजी से बढ़ती हुई मेगा सिटीज में जलवायु परिवर्तन से खतरे के बारे में मैपलक्रॉफ्ट कंपनी ने रिपोर्ट जारी की है। सर्वे में 200 देशों पर जलवायु परिवर्तन के असर को आंका गया है। दुनिया के तेजी से बढ़ रहे टॉप 20 देशों में भी उन्होंने जलवायु परिवर्तन के खतरे को आंका है. साल 2020 तक जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में हैती है जबकि थाइलैंड 37वें नंबर पर है।
ढाका से मुंबई तक

बांग्लादेश की राजधानी ढाका सबसे ज्यादा खतरे में हैं। जबकि मनीला, कोलकाता, जकार्ता, किंशासा, लागोस, दिल्ली और गुआंगझू एक्सट्रीम से हाई रिस्क में हैं। मैपलक्रोफ्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इन शहरों में बढ़ती जनसंख्या का खराब प्रशासन, गरीबी, भ्रष्टाचार सहित अन्य सामाजिक आर्थिक कारण हैं जो निवासियों और व्यवसाय के लिए बड़ा खतरा हैं। इसका मतलब है कि मूलभूत संरचना को और विकसित करने की कोई जगह नहीं है। अगर इन शहरों में जनसंख्या बढ़ जाती है तो आपात प्रणाली को प्रभावी नहीं बनाया जा सकेगा खासकर तब जब मौसम की मार अक्सर पड़ने लगेगी।

अलग अलग जानकारों की एक राय

मैपलक्रॉफ्ट की मुख्य पर्यावरण विश्लेषक चार्ली बेल्डन के मुताबिक इसका असर काफी आगे तक होगा। सिर्फ वहां के निवासियों कि लिए ही नहीं बल्कि व्यापार, राष्ट्रीय विकास और निवेश पर भी गहरा असर पड़ेगा. आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी और इन देशों का आर्थिक महत्व प्रभावित होगा। मैपलक्रॉफ्ट दुनिया भर में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों का विश्लेषण करता है और लोगों पर उसके प्रभाव और गंभीरता पर नजर रखता है।

मनीला और फिलीपीन्स व्यावसायिक केंद्र हैं और चूंकि यहां जनसंख्या बहुत ज्यादा और यह लगातार बढ़ ही है तो उस पर बाढ़ और तूफान का असर भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि एशियाई क्षेत्रों में बारिश बहुत ज्यादा होगी. बताया जा रहा है कि 2010 से 2020 के बीच इन शहरों में और 22 लाख लोग और जुड़ जाएंगे।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ विकासशील देशों के शहर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित नहीं हैं। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में आई बारिश के कारण हुई तबाही दिखाती है कि विकसित देशों के विकसित शहर भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। मियामी आज भी उतने ही खतरे में है जितना सिंगापुर है। जबकि न्यूयॉर्क और सिडनी मध्यम रिस्क की श्रेणी में हैं। लंदन एकदम कम खतरे (लो रिस्क) पर है। बैंकॉक एक्सट्रीम रिस्क की कैटेगरी में है।

औद्योगिक क्रांति

19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है। कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में अभूतपूर्व और अत्यधिक तेजी से वृद्धि हुई है। मीथेन, ओजोन और अन्य गैसों के साथ धूल में भी बहुत बढ़ोत्तरी हुई है। इन सबका पृथ्वी की जलवायु पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। विडंबना यह है कि यह प्राकृतिक ‘ग्रीनहाउस’ प्रभाव ही था जिसने पृथ्वी को पर्याप्त गर्मी प्रदान कर जीवन के लिए अनुकूल बनाया और आज यही हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है

सभी अध्ययन इस दिशा की ओर इंगित करते हैं कि वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन स्तर में कमी नहीं आ रही है। इसलिए ये जरूरी है कि  कि जलवायु में बदलाव संबंधी मॉडलों का अध्ययन भविष्य की जलवायु में हो सकने वाले परिवर्तनों के आधार पर किया जाए। विभिन्न मॉडलों से प्राप्त परिणामों के आधार पर वैज्ञानिकों ने आने वाले सदी के लिए निम्नांकित भविष्यवाणियां की हैं।

1. जलवायु की चरम स्थिति की आवृत्ति या बारम्बारता में परिवर्तन संभावित है जिससे बाढ़ एवं सूखे का खतरा बढ़ जाएगा। सर्द काल में कमी आएगी और ग्रीष्म काल बढ़ेगा।

2. ‘अल नीनो’ की बारम्बारता और इसकी तीव्रता प्रभावित हो सकती है।

3. वर्ष 2100 तक विश्व के औसत समुद्र स्तर में 9.88 सेंटीमीटर की वृद्धि संभावित है।

शोध में ग्रीनहाउस गैसों, जैसे नाइट्रोजन और कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन के 11 मॉडलों को जांचा गया और देखा गया कि साल 2100 तक इस तरह के उत्सर्जन का दुनिया की 29 नदियों पर क्या असर होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर तापमान चार से पांच डिग्री तक बढ़ते हैं तो एक बाढ़ जो हर 100 साल आता में था, वह संवेदनशील इलाकों में हर 10 से 50 सालों में दोबारा आ सकता है। टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के शिंजीरो कानाए का कहना है कि इनमें से कई इलाकों में अब भी बाढ़ आती है लेकिन अगर 2100 तक तापमान घटते हैं तो बाढ़ भी कम होंगे।

इस शोध में खास बात यह है कि इसमें उत्सर्जन के लिए कई मॉडल का इस्तेमाल हुआ है, यानी अलग अलग तापमान और आंकड़ों का अनुमान लगाकर शोधकर्ताओं ने भविष्य के लिए संभावनाओं का आकलन किया है. पहले के शोधों में केवल एक या दो मॉडल का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि इस शोध में शामिल वैज्ञानिक खुद कहते हैं कि अलग अलग क्षेत्रों के मौसम में फर्क से शोध के नतीजे बदल सकते हैं। साथ ही बाढ़ को बढ़ाने या उसे रोकने वाली वजहों की बात नहीं की गई है।
इस वक्त संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने धरती के तापमान को ज्यादा से ज्यादा दो डिग्री तक बढ़ने देने की शपथ ली है। इस वक्त धरती के तापमान में चार से पांच डिग्री की बढ़ोतरी हुई है, कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे जैव विविधता पर बुरा असर पड़ेगा और दुनिया में लाखों लोग भूख से मरेंगे।

 2007 में मौसम का कहर

2007 में बिगड़ते मौसम ने इतनी जगहों पर कहर ढाया, जितना पहले कभी नहीं देखा गया। 2005 में संयुक्त राष्ट्र के राहत-कार्यलय ने आपातकालीन मदद के लिए 10 दरख्वास्त की थी लेकिन 2007 में यह बढ़कर 14 हो गयीं। सन्‌ 2007 में जिन देशों पर मौसम की मार पड़ी, उनमें से कुछ के बारे में नीचे बताया गया है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि ये विपत्तियाँ उन देशों में आती रहेंगी।

ब्रिटेन में 2007 में आयी भयानक बाढ़ की वजह से 3,50,000 से ज़्यादा लोगों को भारी नुकसान पहुँचा। इतनी भयंकर बाढ़ पिछले 60 सालों में कभी नहीं आयी। इंग्लैंड और वेल्स में सन्‌ 1766 से, जब से बारिश का रिकॉर्ड रखा जाने लगा, तब से अब तक की सबसे ज़्यादा बारिश सन्‌ 2007 में मई से जुलाई के बीच हुई।

पश्चिम अफ्रीका में बाढ़ ने चौदह देशों में 8,00,000 लोगों पर कहर ढाया।

बांग्लादेश: बाढ़ की वजह से 85 लाख लोगों की ज़िंदगी में आफत आ गयी। 3,000 से ज़्यादा इंसान और 12.5 लाख पालतू जानवर इसकी भेंट चढ़ गए। इसके अलावा करीब 15 लाख घर या तो टूट-फूट गए या पूरी तरह से ढह गए।
भारत में बाढ़ की वजह से 3 करोड़ लोगों पर बुरा असर हुआ।
पाकिस्तान: तूफानी बारिश की वजह से 3,77,000 लोग बेघर हो गए और सैंकड़ों की जान चली गयी।
बोलीविया में 3,50,000 लोग बाढ़ से प्रभावित हुए और 25,000 लोगों के सिर से छत उठ गयी।
मेक्सिको: देश में आयी बाढ़ की वजह से करीब 5,00,000 लोग बेघर हो गए और 10 लाख से ज़्यादा लोगों पर इसका बुरा असर हुआ।
अमरीका में दक्षिण केलिफोर्निया के जंगलों और खेतों में आग लगने की वजह से 5,00,000 लोगों को मजबूरन अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा।
क्या परमाणु ऊर्जा से हल निकल सकता है?

दुनिया-भर में ऊर्जा के इस्तेमाल में काफी बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए कुछ सरकारें परमाणु ऊर्जा इस्तेमाल करने की सोच रही हैं, क्योंकि तेल और कोयले को जलाने से जो ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, उनसे पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है। लेकिन परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल का चुनाव भी मुश्किलें खड़ी करता है।

इंटरनैशनल हेरल्ड ट्रिब्यून अखबार रिपोर्ट करता है कि सबसे ज़्यादा परमाणु ऊर्जा फ्रांस में पैदा की जाती है। वहाँ परमाणु रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए हर साल करीब 190 खरब लीटर पानी इस्तेमाल किया जाता है, जो गर्म होने के बाद नदियों में छोड़ दिया जाता है। लेकिन सन्‌ 2003 में हद-से-ज़्यादा गर्मी बढ़ने की वजह से, इन नदियों का तापमान और बढ़ गया, जो कि पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकता था। इसलिए कुछ परमाणु रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। अगर धरती का तापमान बढ़ गया, तो हालात और गंभीर होने की संभावना है।

जलवायु पर अध्ययन करनेवाली संयुक्त राष्ट्र की एक समिति, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने हाल की एक रिपोर्ट में बताया कि धरती का बढ़ता तापमान एक सच्चाई है और इसके लिए काफी हद तक इंसान ही कसूरवार है। लेकिन कुछ लोगों के मुताबिक इंसान इसका जिम्मेदार नहीं है, पर वे इतना जरूर मानते हैं कि शहरों में लोगों की तादाद बढ़ जाने की वजह से वहाँ का तापमान चढ़ता जा रहा है। इसके अलावा कंक्रीट और स्टील सूरज की गर्मी जल्दी सोख लेते हैं, मगर रात में उन्हें ठंडा होने में काफी वक्त लगता है। आलोचकों का कहना है कि शहरों के तापमान से हम ग्रामीण इलाकों के तापमान का अंदाज़ा नहीं लगा सकते। इसलिए धरती के सही तापमान का पता लगाना मुश्किल है।

जानकार की राय पर्यावरण मामलों के जानकार प्रशांत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर चुनौती है। सरकारी एजेंसियों के साथ साथ आम लोगों को भी पर्यावरण का ख्याल रखना होगा। जिस तरह से तापमान में बढ़ोतरी हो रही है वो आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात और सूनामी को निमंत्रण दे रही है। जहां तक भारत के तटीय शहरों पर मंडरा रहे खतरे की बात है तो ये एक सच्चाई है। एजेंसियों को मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here