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# राईट टू एजुकेशन (शिक्षा-प्रशिक्षण का अधिकार)
क्या 25 वर्ष तक सभी को निःशुल्क, अनिवार्य और अबाधरूप से शिक्षा मिले ?
राष्ट्रकोष (बजट) का 25% धन शिक्षण/प्रशिक्षण पर खर्च होना चाहिए ?
अभी तो केवल 2% या 3% ही शिक्षा पर सरकार खर्च करती है । बड़ी मुश्किल में सरकार ने अभी कुछ थोडा बढ़ाया था किन्तु फिर से शिक्षाबजट घटा लिया है । व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण शिक्षा के द्वारा ही संभव होता है । यदि राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के लिए समुचित शिक्षा की सुलभता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो निश्चय ही जनता का व्यक्तित्व कुंठित हो जायेगा । कुंठित व्यक्तित्व सम्पूर्ण राष्ट्र को विनाश के गर्त में झोंक देता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी मानवीय अंतःकरण चतुष्टय का परिष्कार करने के लिए भाषा-Language, गणित-Maths, संज्ञान-General Knowledge, दर्शन-Philosophy, आदि चारो विषयों की सम्यक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए । साथ ही कृषि-Agriculture, वाणिज्य-Commerce, प्रशासन-Public Services, नेतृत्व-Leadership, आदि कर्मों का कौशल प्रदान करने के लिए समुचित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है । कौशल के बिना कर्मसम्पादन सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता । अतः उपरोक्त शिक्षा-प्रशिक्षण मानवीय व्यक्तित्व के निर्माण हेतु परम आवश्यक है । व्यक्ति में गुणवत्ता, योग्यता, क्षमता, कौशल का विकास इस शिक्षा-प्रशिक्षण के द्वारा ही संभव होता है । इसलिए राष्ट्रीय सरकार का यह प्राथमिक उत्तरदायित्व भी सिद्ध होता है की वह जनता में से प्रत्येक व्यक्ति को यह शिक्षण-प्रशिक्षण समुचित रूप से प्रदान करें । यही राष्ट्रीय जनता का प्राथमिक जनाधिकार भी है…!!
# राईट टू एम्प्लॉयमेंट (रोजगार का अधिकार)
क्या राष्ट्रकोष (बजट) का 25% धन राष्ट्र के नागरिकों के प्रत्येक परिवार के रोजगार हेतु खर्च किया जाना चाहिए ?
किन्तु सरकार को रोजगार से अभी कोई मतलब ही नहीं है । रोजगार किसी भी राष्ट्र में कभी भी कम नहीं होता । रोजगार का संसाधन सदा उतना ही रहता है, जितना कभी होगा ।अनादिकाल से चार ही रोजगार रहे हैं-कृषि-Agriculture, वाणिज्य-Commerce, प्रशासन-Public Services और नेतृत्व-Leadership । इन चारो रोजगारों में से वरीयता, अहर्ता, पात्रता के अनुरूप प्रति परिवार एक रोजगार दीजिये । यदि किसी परिवार के पास कोई भी एक रोजगार है, तो उसे दूसरा रोजगार पाने का अधिकार नहीं । यदि आपके पास कृषिभूमि है, तो आप न वाणिज्य कर सकते हैं, न सार्वजनिक सेवा के किसी सरकारी पद पर कार्य कर सकते हैं और न ही नेतृत्व कर सकते हैं । कृषि के अंतर्गत खेती, उद्यान, पशुपालन आदि कर्म समाहित हैं । वाणिज्य के अंतर्गत व्यापार, उद्योग और व्यवसाय समाहित हैं । कृषिकर्म के लिए 5 से 10 एकड़ भूमि यदि प्रतिपरिवार आधार पर प्रदान की जाए तो बड़े आराम से एक परिवार चल जायेगा ।लेकिन अभी ऐसा नहीं है । बड़ी चतुराई से जिसने कृषिभूमि पर कब्ज़ा किया है उसी ने व्यापार भी चला रखा है, होटल भी खोल रखा है और उसी परिवार का सदस्य प्रशासनिक पद जैसे कलक्टर भी बना बैठा है फिर उसके बाद उसी परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ने के लिए पर्चा लेकर खड़ा मिलेगा । भैया, एक दूकान ठीक से चलाना बहुत परिश्रम का काम है, मुश्किल है । इतने सारे काम आप एक साथ कैसे कर लेते हो ? रोबोट हो गए हो क्या ? बड़ी आश्चर्यजनक बात है । एक परिवार के लिए एक एम्प्लॉयमेंट पर्याप्त है । परिवार की निर्धारित परिभाषा से अधिक संख्या होने पर आप दूसरा रोजगार ले लीजिये । ये क्या बात हुयी की जिसके घर में पहले से ही अनेक रोजगार हैं, होटल चल रहे हैं, कारखाने चल रहे हैं, वही सरकारी पद पर बैठ रहा है । लाखों रुपया महिना व्यापार से कमाता है और सरकारी नौकरी से भी पचासों हज़ार रूपये महिना और खिंच रहा है । जबकि उससे ज्यादा योग्य व्यक्ति प्रशासन के उस पद पर नहीं जा पा रहा है, क्योंकि उस बेचारे का कोई ताम झाम नहीं है, सोर्स नहीं है, पहुँच नहीं है ।
संसाधन उतने ही होते हैं । लेकिन कोई एक ही व्यक्ति या परिवार सभी संसाधनों पर कब्ज़ा करके बैठ जाये, तो औरों के लिए आभाव उत्पन्न हो जायेगा । ऐसी स्थिति में राजनेता बाहर से आकर दावा करेगा की वह नए पद क्रियेट कटेगा और लोगों को रोजगार वितरित करेगा । किन्तु पूर्वकब्जेदारों को सभी पदों पर बैठाए रखेगा ।
जब 1947 में आज़ादी हुयी तो सारे राजाओं के पास राजकोष के रूप में जनता का जो धन था, उन राजाओं ने उसपर कब्ज़ा कर लिया । उस समय लगभग 365 रियासतें थीं और उन रियासतों के राजाओं ने उस सार्वजनिक धन पर कब्ज़ा कर लिया । अन्य भी सारी संपत्तिया उनके नाम पर रजिस्टर्ड कर दी गयी । चलो कोई बात नहीं उनकी धनलिप्सा को देखते हुए उन्हें वैश्य अथवा वनिक बनाकर छोड़ दिया जाना चाहिए था । किन्तु ऐसा नहीं हुवा वे सब राजाओं ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन करा । बड़ी परेशानी हुयी बेचारी जनता को तब से आजतक । क्या आप लोग इन सभी बातों से परिचित नहीं थे ? अब आपलोग सभी कुछ जानते हो, क्योंकि आपलोग अब पढ़-लिख गए हो । अब आप 50 साल पहले वाले हिंदुस्थानी नहीं रहे हो । 50 साल पहले वाले हिंदुस्थानी को तो कुछ समझ में ही नहीं आता था । लेकिन अब आप शिक्षित हो, समझदार हो गए हो, इसलिए अब आप सभी न्यायशील जनाधिकारों को समझ पा रहे हो…!!
# राईट टू एकोमोडेशन (सुखसुविधा का अधिकार)
क्या सुखसुविधाओं का वितरण राष्ट्र के सभी क्षेत्रों को किया जाना चाहिए और इन सुखसुविधाओं जैसे सड़क, पानी, बिजली आदि पर 25% राष्ट्रकोष (बजट) का वार्षिक बजट खर्च किया जाना चाहिए ??
इसके लिए 5 से 10 हज़ार आबादी का एक गाँव मान लो और समुचित रूप से सभी क्षेत्रों को सुखसुविधाएँ वितरित करो । गाँव और शहर के बीच विकासस्तर में इतना फासला क्यों है ? ये गाँव और शहर क्या होता है ? सम्पूर्ण राष्ट्र में प्रतिगाँव आधार पर सुखसुविधाएं दी जानी चाहिए । जो प्रतिग्राम आधार पर संभव नहीं, वह जिले स्तर पर हो, किन्तु यह क्या की आपने सारा सार्वजनिक धन कुछ ही विशिष्ट स्थानों को दे दिया । जैसे आपने एक क्षेत्रविशेष को स्टेडियम दे दिया किन्तु दुसरे क्षेत्र के व्यक्ति को उससे क्या लेना देना ? एक जगदलपुर के आदमी को दिल्ली के स्टेडियम से क्या लेना देना ? धोखा क्यों कर रहे हो ? प्रतिग्राम आधार पर न्यायपूर्वक सुखसुविधाएं दो । लेकिन नहीं, कैसी जाहिलियत है आज ! आम आदमी परेशानी उठा रहा है । घोर असुविधाओं में जी रहा है थोड़े से लगभग 5% व्यक्तियों ने 95% जनता के खून पीने का कार्यक्रम चला रखा है । इसको कहते हैं, राजनीति ! कुछ राजा लोग और उनके समर्थक चाटुकार लोग बड़े आनंद के साथ सार्वजनिक धन को लूट रहे हैं और खूब सुखसुविधाएं भोग रहे हैं ।
सार्वजनिक धन से पेट्रोल पर सब्सिडी दी जाती है । क्या आप सभी यह बात नहीं जानते ? क्या यह अन्याय नहीं हैं ? सार्वजनिक धन से पेट्रोल पर सब्सिडी कैसे दी जा सकती है ? जितने का पेट्रोल है, उस पर उतनी ही सब्सिडी दी जाती है । रसोई गैस पर भी सब्सिडी दी जा रही है, सार्वजनिक धन से । क्या गैस उपभोक्ता आम जनता है? नहीं ! जब राष्ट्रकोष सार्वजनिक धन है, तो उससे सार्वजनिक कार्य ही किये जा सकते हैं, किसी वर्गविशेष के लिए नहीं । एक पेट्रोलयूजर वर्ग, एक गैसयूजर वर्ग आदि कुछ लोग सार्वजनिक धन अपने गिलास में डालकर पी रहे हैं । क्या यह धोखा नहीं है ? आप सब क्या इसको न्याय मानोगे ? इसे न्याय नहीं कहा जा सकता । यह धोखाधड़ी है । आप सभी के साथ धोखा हो रहा है । अपने इस जनाधिकार को पहचाने…!!
# राईट टू प्रोटेक्शन (संरक्षण का अधिकार)
क्या सम्पूर्ण राष्ट्र के सभी संवर्गों को समुचित संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए ? चिकित्सा, सुरक्षा, न्यायालय, बैंकिंग, बीमा आदि सार्वजनिक संरक्षण सेवाएं जनता को न्यायपूर्वक वितरित की जानी चाहिए ? इस संरक्षण पर 25% राष्ट्रकोष (बजट) का वार्षिक बजट खर्च किया जाना चाहिए ?
एक आदमी जो ज्यादा चतुर हो गया है, उसको कहते हैं, अच्छा ठीक है ज्यादा बोल रहे हो, तुमको आरक्षण दे देंगे । आरक्षण से क्या होगा ? आरक्षण नहीं सबको अधिकार दो । फंडामेंटल राइट जो एक प्रधानमंत्री का है, वही एक आम नागरिक का होना चाहिए । जो जीवनाधिकार देश के राष्ट्रपति का है, वही देश के किसी भी नागरिक का होना चाहिए । आरक्षण किसको दिया जा रहा है ? आरक्षण से क्या होगा ? आरक्षण का लाभ भी वही उठा पा रहा है जो कुछ चतुर है, सबल है । अतः आरक्षण नहीं, फंडामेंटल राइट्स दो । आरक्षण की चटनी क्यों चटवा रहे हो ? आम आदमी का आरक्षण तो वोट लेने की नीतिमात्र है की तुमको आरक्षण प्राप्त है और जिनको आरक्षण प्राप्त है, जाकर उनकी हालत गाँव में देखो ! जैसी हालत आज से 1000 साल पहले थी, वैसी ही आज भी है । पिछले 65 सालों से आरक्षण प्राप्त करने पर भी आरक्षित आदमी जिसको की आरक्षण मिलना था, उसकी स्थिति जैसी की तैसी बनी हुयी है । ये क्या नाटक है ? न्याय कहता है आरक्षण की क्या जरुरत है ? हिन्दू है, की मुस्लिम है, की सिख है, की इसाई है, की बाहरी है, की आगंतुक है, की विदेशी है, की आदिवासी है, की अल्पसंख्यक है या बहुसंख्यक है, इससे क्या मतलब है ? सम्पूर्ण स्रष्टि संरक्षणीय है । समष्टि के चारो संवर्गो को समुचित संरक्षण प्रदान करके ही राष्ट्रीय जीवन को संरक्षित बनाया जा सकता है । जड़-पदार्थ, वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि चारो संवर्गों का जीवन संयुक्त है अन्योन्याश्रित है । इसकी अंतर्सम्बंधता और पारस्परिक निर्भरता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय संरक्षण खर्च निर्धारित किया जाना चाहिए जो की जनाधिकार है…!!

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